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In the garden

 

हाँ, मैं यहाँ रहती हूँ।

बहुत सालों की खोज के बाद हम एक रहने लायक़ जगह पर पहुँचे हैं।

हर इंसान के रहने लायक़, सिर्फ़ हमारे लिये ही नहीं।

पर ये लूटी हुई ज़मीन है। इसे लूटने के लिये औस्ट्रेलिया के अधिकांश आदि-वासियों को मारा गाया।

तो मेरा इस पर कोई हक़ ही नहीं है।

मैं सोचती हूँ, कि क्या दुनिया भर के शरणार्थी परिवार, जो लूटी हुइ ज़मीनों पर बस गए हैं - आज के अमेरिका, कैनडा, औस्ट्रेलिया - भी ऐसा सोचते हैं? मुझे यक़ीन है कि उनको भी इन ज़मीनों के आदि-वासियों का दर्द है।

मैंने फ़ैसला कर लिया है, अपने पुरखों की दुनिया में वापस जाने का। और किसी ऐसे से ज़मीन ख़रीदने का, जो अपनी ज़मीन अपनी मर्ज़ी से मुझे बेचने को तैयार है।

मैं वहाँ पर अपने लिए अपना स्वर्ग बनाऊँगी और बिना किसी अपराध बोध के जियूँगी।

अगर आप भी इंसानों के रहने लायक़ ज़मीन ढूँढ रहे हैं तो मेरे साथ जुड़ें!

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